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योनि की आत्मकथा

मैं एक 3.5 से 4 इंच लंबी और करीब 3 इंच परिधि की एक पिचकी हुई ट्यूब-नुमा नाली हूँ जिसका एक सिरा जाँघों के बीच खुलता है और दूसरा सिरा गर्भाशय से जुड़ा हुआ है। यह अंदर वाला सिरा लगभग बंद है और सिर्फ बहुत सूक्ष्म तत्व या पदार्थ ही इसके पार गर्भाशय में जा सकता है। मेरे आकार को तुम एक पिचके हुए कंडोम की तरह समझ सकते हो।
मेरे अंदर की दीवारें लचीली होती हैं जिससे यौन उत्तेजना के समय मेरा आकार बढ़कर 5 से 6 इंच का हो जाता है। मेरी दीवारों में ऐसी ग्रंथियाँ होती हैं जो उत्तेजना के समय तरल द्रव्यों का प्रवाह करती हैं जिनसे मैं अंदर से नम या गीली हो जाती हूँ। ऐसा होने से मेरे अंदर पुरुष के लिंग का प्रवेश आसान हो जाता है और मुझे तकलीफ नहीं होती।
मेरे द्वार से लेकर करीब डेढ़ इंच अंदर तक मेरी दीवारों में अनेक तंत्रिकाएँ होती हैं जिनसे स्पर्श, घर्षण, दर्द या सुख की अनुभूति होती है। मेरे बाकी के अंदर के इलाके में ये तंत्रिकाएं नहीं होतीं हैं... अतः शुरू के डेढ़ इंच बाद अंदर कुछ महसूस नहीं होता।

यह बात आप को पता नहीं है... फालतू में अपने 5 इंच के उत्तेजित लिंग को छोटा समझता है। सच में, मुझे तो केवल दो-तीन इंच का लिंग भी आनंद देने के लिए पर्याप्त है। सच पूछो तो 5-6 इंच से ज्यादा लंबे लिंग तो मेरे उत्तेजित आकार से बड़े होते हैं... सो मुझे तकलीफ दे सकते हैं और गर्भाशय को चोट भी पहुंचा सकते हैं। लम्बाई से ज्यादा तो मुझे मोटे और कड़क लिंग ज्यादा पसंद हैं जो मेरी तंत्रिकाओं को प्रबलता से रगड़ पाते हैं और असीम आनंद देते हैं।
जब मैं पैदा हुई थी तो मेरा आकार करीब डेढ़ इंच लंबा था और मेरा मुंह काफी छोटा था। करीब पांच साल की उम्र तक मेरा आकार लगभग उतना ही रहा। उन दिनों जब नंगी खड़ी होती थी तो कोई भी मुझे देख सकता था क्योंकि मैं सीधी और खड़ी दिशा में, लगभग लम्बवत, (vertical) थी ... सबके सामने... मुझे कोई शर्म नहीं थी... पर जबसे मैं यौवनावस्था में क़दम रखा है तबसे मेरे ठीक ऊपर स्थित शुक्र-टीला (Mound of Venus) धीरे-धीरे पनपने लगा और उसके उभार के कारण मैं नीचे की तरफ होने लगी।
मैं सोलहवें साल के आस-पास तक मैं लगभग ज़मीन के समानांतर दिशा में, लगभग दंडवत (horizontal) हो गयी थी। इसी दौरान जब मैं बारह साल की हुई थी तब मेरे होठों के आस-पास बाल आने शुरू हो गए थे.... शुरू में बहुत ही मुलायम, काले रेशम जैसे इक्का-दुक्का बाल आये जो कि मेरे होंठों के इर्द-गिर्द उगे थे... धीरे-धीरे 3-4 साल में ये बाल घने होते चले गए और मेरे होटों को तथा मेरे आस-पास के इलाके को एक तिकोने आकार से ढक दिया। कहने का मतलब यह कि जहाँ मैं बचपन में मैं बड़ी शान से अपने आप को दिखा सकती थी, उसकी जवानी के आते-आते मैं ना केवल उसकी जाँघों के बीच, ज़मीन के समानांतर हो गई, मेरे ऊपर बालों का घूंघट सा भी आ गया। इसके फलस्वरूप औरों की बात तो दूर, खुद महिला भी नंगी होकर मुझे ठीक से देख नहीं सकती थी। उसे मेरे दर्शन करने के लिए किसी रोशन इलाके में आगे झुक कर, टांगें खोल कर, बालों का झुरमुट हटा कर एक दर्पण की ज़रूरत होती है। शायद इसीलिए उसने मुझे ठीक से देखा नहीं है
देखा जाये तो मैं जननांगों का बाहरी प्रारूप हूँ... जननांग मतलब प्रसव अथवा प्रसूति अंग या जन्म देने वाले अंग। मैं गर्भाशय तक मरदाना जीवाणु पहुँचाने का मार्ग हूँ... मेरी भूमिका इतनी महत्वपूर्ण है कि प्रकृति ने मेरी सुरक्षा के लिए दो-दो द्वार (double-door) लगाये हुए हैं... बड़े भगोष्ठ और छोटे भगोष्ठ। ये दोनों प्रायः बंद ही रहते है और बाहरी गंदगी और कीटाणुओं से मेरा बचाव करते हैं। इन दोनों होटों के बंद होने के बावजूद भी अंदर मैं पिचकी हुई ही रहती हूँ। मेरा यह पिचका रहना ना केवल बाहर के प्रदूषण से एक अतिरिक्त बचाव है बल्कि यौन संसर्ग के दौरान यह घर्षण पैदा करने का निराला तरीका है।
मेरे दो मुख्य कार्य हैं... प्रजनन तथा यौन-सुख का आदान-प्रदान। मैं यौन सुख देती भी हूँ और लेती भी हूँ। मूत्र का निर्गम भी मैं ही करती हूँ पर यह गलत है। मेरे समीप, ऊपरी भाग में और भगनासा के नीचे मूत्राशय का छेद है जहाँ से पेशाब करती है।
जहाँ छोटे भगोष्ठ ऊपर को मिलते हैं वहाँ पर शरीर का सबसे संवेदनशील अंग है जिसे भगनासा (clitoris) कहते हैं। यह आकार में लगभग एक मटर के दाने के समान होती है। इसमें करीब 8000 से ज्यादा तंत्रिकाएं केंद्रित होती हैं जिस कारण यह बहुत ही मार्मिक अंग बन जाती है... इतनी तंत्रिकाएं तो पुरुष के लिंग के सुपाड़े में भी नहीं होतीं। यह इतनी मार्मिक होती है कि प्रकृति ने इसे एक घूंघट-नुमा टोपे में छुपाया होता है जिससे यह अप्रत्याशित घर्षण से बच जाये। इसे मैं पुरुष के लिंग के समरूप मानती हूँ... यह भी लिंग की ही तरह उत्तेजना पर उभर जाती है और अपने घूंघट से बाहर आ जाती है... और लिंग के सुपाड़े की ही तरह इसका स्पर्श ज़ोरदार रोमांच पैदा कर देता है। इसको छूने से या हल्के से सहलाने से मज़ा तो बहुत आता है पर इसके ऊपर ज्यादा दबाव या घर्षण सह नहीं पाती, खास तौर से चरमोत्कर्ष के तुरंत बाद... इससे उसको पीड़ा भी हो सकती है।
नाम से तो लघु भगोष्ठ (Labia Minora) छोटे होने चाहियें पर अक्सर ये काफी बड़े होते हैं और कई बार ये भगोष्ठ (Labia Majora) के अंदर नहीं समा पाते और बाहर दिखाई देते हैं। मेरा आकार और रूप लघु भगोष्ठों के कारण ही भिन्न-भिन्न होता है।

कुछ लोग समझते हैं कि मैं एक छेद हूँ जिसके पीछे कोई सुरंग या गुफा नुमा ट्यूब है जिसमें सम्भोग के समय पुरुष का लिंग जाता है। मैं कोई खोखली सुरंग नहीं हूँ... मैं हमेशा पिचकी हुई और बंद रहती हूँ। सम्भोग के दौरान लिंग का प्रवेश मुझे खोलता हुआ अंदर जाता है और जब वह बाहर आता है तो मैं अपने आप फिर से बंद हो जाती हूँ। इस कारण पुरुष को हर बार लिंग प्रवेश करने में घर्षण का आनंद मिलता है... मेरे अंदर की दीवारें लिंग की पूरी लम्बाई पर संपर्क बनाये रखती हैं जिससे पूरे लिंग को अंदर-बाहर होते समय घर्षण का अहसास होता है। अगर मैं ऐसी नहीं होती तो मर्दों को यौन सुख का मज़ा नहीं मिलता और शायद मैं मैथुन-सुख से वंचित रह जाती।

जैसा मैंने कहा, पैदा होने से लेकर उसकी पांचवीं सालगिरह तक मेरे रूप और आकार में ज्यादा बदलाव नहीं आया। फिर अगले दो-तीन साल तक मेरा आकार थोडा बड़ा हुआ। इसके बाद तो मैंने यौवनावस्था में क़दम रखा (11-12 वर्ष की उम्र) तभी मेरे आकार और रूप में बदलाव आने शुरू हुए। ऊपर प्रगति के स्तनों का विकास शुरू हुआ और नीचे मेरे द्वार के इर्द-गिर्द बाल आने शुरू हो गए। मेरे ऊपर स्थित शुक्र-टीला (Mound of Venus) बढ़ने लगा... मेरे लघु भगोष्ठ बड़े होकर हल्के-हल्के बाहर प्रकट होने लगे... उनका रंग गुलाबी से बदल कर कत्थई सा होने लगा और उनकी अंदरूनी दीवारों का गीलापन बढ़ने लगा। गर्भाशय (Uterus) और अंडाशय (Ovaries) के विकास के साथ-साथ उसके शरीर में और कई बदलाव आने लगे। उसके स्तनों, कमर, कूल्हों, जांघों, ऊपरी बाजू और जघन हिस्से (Pubic Area) में चर्बी की मात्रा बढ़ने लगी जिससे उसके अंगों में गोलाई बढ़ने लगी। अगले दो-तीन सालों तक यह उन्नति होती रही... शरीर सुडौल होता गया... स्तन उभर आये तथा चूचक बड़े हो गए। अब मैं पहले की तरह फ्रॉक नहीं पहन सकती थी... चोली और दुपट्टे की ज़रूरत होने लगी। कूल्हे पीछे की ओर उभर कर अपना अस्तित्व दर्शाने लगे। लघु भगोष्ठ और बड़े हो गए और भगनासा उभर कर दिखने लगी... चेहरे पर मुहांसे आने लगे और पसीने की दुर्गन्ध वयस्क हो गई।

अचानक एक दिन, जब 13 साल की थी, तब पहली बार माहवारी का रिसाव हुआ। मुझे याद है मैं कितना डर गई थी और रोती-रोती अपनी माँ के पास गई थी जिसने उसको इस बारे में समझाया और दिलासा दिया था।


माहवारी शुरू होना प्रजनन-योग्य होने का प्रतीक था। हालांकि, अभी 4-5 वर्ष तक प्रजनन के बाकी अंग परिपक्व नहीं होंगे और तब तक उसके लिए प्रसव जोखिम दायक हो सकता है।

यहाँ मैं माहवारी चक्र के बारे में बता दूँ। मेरा माहवारी चक्र सामान्यतः 28 दिन का होता है। क्योंकि प्रकृति ने गर्भाशय को प्रजनन के लिए बनाया है, हर 28 दिन के क्रम में, दोनों अंडाशयों में से एक अंडाशय, एक अंडा गर्भाशय में भेजता है। यह अंडा ग्रीवा के समीप पुरुष के शुक्राणु से मिलने का इंतज़ार करता रहता है। साथ ही गर्भाशय की अंदरूनी परत गर्भधारण की तैयारी में लग जाती है। अगर इस अंडे का पुरुष के वीर्योपात के करोड़ों में से किसी एक भी शुक्राणु से सफल मिलन हो जाता है तो गर्भ बैठ जाता है और गर्भाशय में अगले 9 महीनों तक भ्रूण पनपता है और फिर शिशु का जन्म होता है।
अगर किसी कारण अंडे और शुक्राणु का मिलन नहीं होता तो गर्भाशय हर 28 दिन अपनी अंदरूनी परत को त्याग देता है। यह परत मेरे मार्ग से होती हुई बाहर आती है जिसे माहवारी कहते हैं। माहवारी में रिसने वाले तरल पदार्थ मात्रा में करीब दो से ढाई चम्मच के होते हैं। यह केवल रक्त होता है पर ऐसा नहीं है। इसमें गर्भाशय की अंदरूनी परत के अंश, मेरे रिसाव वाले तरल पदार्थ तथा परत के छूटने से निकले रक्त के अंश होते हैं। इसका रंग गहरा कत्थई-लाल होता है और यह आम खून की तरह जल्दी से जमता नहीं है। ना ही इसके रिसाव से रक्त में लोहे की मात्रा (Hb) कम होती है। इतना ज़रूर है कि माहवारी का प्रजनन क्रिया और गर्भधारण से गहरा सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध का गर्भधारण के लिए तथा गर्भ-निरोधन, दोनों के लिए उपयोग किया जा सकता है।
माहवारी चक्र सामान्यतः 28 दिन का होता है पर यह 2-4 दिन इधर-उधर हो सकता है। माहवारी का बंद हो जाना गर्भ-धारण का सबसे ठोस सबूत माना जाता है। यह चक्र गर्भ-धारण से लेकर शिशु-जन्म तथा उसके उपरान्त शिशु के स्तन-सेवन की अवधि तक बंद रहता है। जब तक यह चक्र दोबारा शुरू नहीं हो जाता आगामी गर्भधारण नहीं हो सकता


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जोश-ए-जवानी

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